Class 10th Hindi Solved Paper (Important)

कक्षा 10th : हिन्दी सॉल्व्ड पेपर 2026



1. रीतिकाल किस समयावधि में माना जाता है-   (2023, 25) 

(A) सन् 1600-1616 ई० तक 
(B) सन् 1800-1818 ई० तक 
(C) सन् 1643-1843 ई० तक        
(D) सन् 1616-1632 ई० तक 


2. आधुनिक काल की समय सीमा है-

(A) सन् 1919 ई० से 1938 ई० तक 
(B) सन् 1936 ई० से 1943 ई० तक 
(C) सन् 1918 ई० से 1950 ई० तक  
(D) सन् 1843 ई० से अब तक              


3. 'कंकाल' के लेखक हैं-  (2023) 

(A) मुंशी प्रेमचन्द    (B) जयशंकरप्रसाद  
(C) निराला            (D) रामचन्द्र शुक्ल   


4. शेखर : एक जीवनी' उपन्यास के लेखक हैं-   (2023, 2025) 

(A) धर्मवीर भारती                     
(B) प्रेमचन्द                    
(C) फणीश्वरनाथ 'रेणु'             
(D) अज्ञेय                      


5. तारसप्तक' काव्य के सम्पादक हैं-   [2024]
अथवा 1943 ई० में प्रकाशित तारसप्तक का सम्पादन किसने किया-

(A) विद्यानिवास मिश्र       
(B) मुक्तिबोध                 
(C) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' 
(D) हजारीप्रसाद द्विवेदी                           


6. शुक्ल युग' की समयावधि है-       (2023) 

(A) सन् 1900 ई० से 1918 ई० तक    
(B) सन् 1919 ई० से 1938 ई० तक   
(C) सन् 1936 ई० से 1943 ई० तक   
(D) सन् 1850 ई० से 1900 ई० तक। 


7. 'ठलुवा क्लब' के लेखक हैं 


(A) गुलाबराय                   
(B) यशपाल               
(C) श्यामसुन्दर दास           
(D) अज्ञेय                   

8. 'प्रिय प्रवास' किस युग की रचना है- 


(A)  द्विवेदी युग            
(B) भारतेन्दु  युग       
(C) प्रगतिवादी युग        
(D) छायावादी युग     


9. भूषण किस युग के कवि हैं-     [2023]

(A) आदिकाल            
(B) रीतिकाल           
(C) भक्तिकाल          
(D) आधुनिककाल   

10. केशवदास किस काव्यधारा के कवि हैं-   [2023]


(A) रीतिबद्ध           
(B) रीतिसिद्ध      
(C) रीतिमुक्त          
(D) प्रयोगवादी    

11. हास्य रस का स्थायी भाव होता है-      [2023, 25]


(A) उत्साह         
(B) हास         
(C) आश्चर्य         
(D) रति         


12. सोहत ओढ़े पीतु पटु, स्याम सलोने गात। मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात ॥ - उपर्युक्त पंक्तियों में अलंकार है- (23) 

(A) उपमा           
(B) उत्प्रेक्षा      
(C) रूपक           
(D) यमक       

13. 'सोरठा' में कितने चरण होते है:- (2023)

(A) तीन                
(B) दो           
(C) चार              
(D) पाँच        

14. 'आकर्षण' शब्द में किस उपसर्ग का प्रयोग किया गया है-

(A) 'वि'         
(B) मान   
(C) अक         
(D) आ      


15. रचना के आधार पर वाक्य के कितने भेद है

(A) दो       
(B) पाँच   
(C) छः       
(D) तीन    


16. 'उत्थान-पतन' में समास है  :- 

(A) कर्मधारय        
(B) द्वन्द         
(C) बहुव्रीहि          
(D) तत्पुरुष   


17. आंसू  का तत्सम रूप है- (1)


(A) अश्रु           
(B) अंशु     
(C) रोना           
(D) आंख     

18. 'कर्तृवाच्य' में किसकी प्रधानता होती है- 

(A). 'कर्ता' की प्रधानता    
(B). 'भाव' की प्रधानता     
(C). 'कर्म' की प्रधानता     
(D)  इनमें  से कोई नही   

19. दोहा' छन्द का ठीक उल्टा छन्द कौन-सा है?

(A) चौपाई        
(B) रोला     
(C) सोरठा       
(D) बरवै     

20. 'अभ्यागत' शब्द मे उपसर्ग है -

(A) अभि             
(B) अपि     
(C) अव                 
(D) आन   

21. गद्य हेतु निर्धारित पाठ्यवस्तु से गद्यांश पर आधारित प्रश्न-

(i)  चिन्ता को लोग चिता कहते हैं, जिसे किसी प्रचण्ड चिन्ता ने पकड़ लिया है, उस बेचारे की जिन्दगी ही खराब हो जाती है, किन्तु ईर्ष्या शायद चिन्ता से भी बदतर चीज़ है, क्योंकि वह मनुष्य के मौलिक गुणों को ही कुण्ठित बना डालती है। मृत्यु शायद फिर भी श्रेष्ठ है, बिना इसके कि हमें अपने गुणों को कुण्ठित बनाकर जीना पड़े। चिन्ता-दग्ध व्यक्ति समाज की दया का पात्र है, किन्तु ईर्ष्या से जला-भुना आदमी जहर की एक चलती-फिरती गठरी के समान है, जो हर जगह वायु को दूषित करती फिरती

(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए-

संदर्भ- प्रस्तुत गध्यांश हमारी पाठ्‌य पुस्तक हिन्दी के 'ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से' पाठ से लिया गया है। इसके लेखक रामधारी सिंह दिनकर है। 

(2) गध्यांश मे रेखांकित भाग की व्याख्या कीजिये-

व्याख्या- लेखक रामधारी सिंह "दिनकर" कहते हैं कि चिन्ता को लोग चिता कहते हैं तथा जिस व्यक्ति को चिन्ता घेर लेती है, उस व्यक्ति का जीवन चिता के समान हो जाता है। जिस जिस प्रकार चिता मनुष्य के मृत शरीर को जलाती है उसी प्रकार चिन्ता मनुष्य के जीवित शरीर को जला देती है। ईष्या चिन्ता से भी खतर‌नाक चीज है। जिसमें मनुष्य वह वस्तुए जो उनके पास ना है, उसके लिए दुःखी होता रहता है तथा अपने आस-पास की चीजो से सुख नहीं भोग पाता है। जिससे मनुष्य के मौलिक गुण कुण्ठित गुणों में परिवर्तित हो जाते हैं। चिन्तित व्यक्ति अपने समाजिक जीवन में दया का पात्र बन जाता है। जिस व्यक्ति को ईर्ष्या घेर लेती है वह व्यक्ति चलती-फिरती जहर की गठरी के समान होता है। जो उस जगह के वातावरण को दूषित कर देता है।

(3) चिंता को लोग चिता क्यों कहते हैं? 

चिता मनुष्य के मृत शरीर को जलाती है तथा चिन्ता जीवित मनुष्य को।

अथवा

(ii) कितना जीवन बरस पड़ा है इन दीवारों पर; जैसे फसाने-अजायब का भंडार खुल पड़ा हो। कहानी-से-कहानी टकराती चली गई है। बन्दरों की कहानी, हाथियों की कहानी, हिरनों की कहानी। कहानी क्रूरता और भय की, दया और त्याग की। जहाँ बेरहमी है वहीं दया का भी समुद्र उमड़ पड़ा है, जहाँ पाप है वहीं क्षमा का सोता फूट पड़ा है। राजा और कँगले, विलासी और भिक्षु, नर और नारी, मनुष्य और पशु सभी कलाकारों के हाथों सिरजते चले गए हैं। हैवान की हैवानी को इंसान की इंसानियत से कैसे जीता जा सकता है, कोई अजन्ता में जाकर देखे। बुद्ध का जीवन हजार धाराओं में होकर बहता है। जन्म से लेकर निर्माण तक उनके जीवन की प्रधान घटनाएँ कुछ ऐसे लिख दी गई हैं कि आँखें अटक जाती हैं, हटने का नाम नहीं लेतीं।

(1) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।   [2012, 14, 17, 20, 23]

सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के 'गद्य-खण्ड' के 'अजन्ता' नामक पाठ से उद्धृत है। इसके लेखक डॉ० भगवतशरण उपाध्याय है।

(2) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए। (2012, 14, 17, 20, 23]

व्याख्या- लेखक भगवतीशरण कहते हैं कि कितने लोगों का जीवन बीत चुका है अजन्ता की गुफाओं की दीवारों में बनी उन् सुन्दर आकृतियों में। हर कलाकार जो वहाँ आया था उसके लिए 'फसाने आयजाब' का भण्डार खुला पड़ा है। कहानियों से क‌हानियाँ बनती गई है। कई सदियों में कई कलाकारों ने वहाँ बन्दरों की कहानियों हाथियों की कहानियाँ, हिरनों की कहानियाँ बनाई थीं। कई कलाकारों ने उनके समय के साम्राज्य में हुई क्रूरता से उत्पन्न दया और त्याग की कहानियों को वहाँ की दीवारों पर प्रस्तुत करके गए। जहाँ पर भी बेरह‌मी की गई थी वहाँ दया भी बढ़ने लगी थी। उन कलाकारों के हाथों से राजा-रंक, नर-नारी, पशु-पक्षी तथा विलासी-भिक्षु सभी रचनाओं तथा कहानियों में सिरजते गए।

(3) कलाकारों के हाथों से क्या-क्या सिरजते चले गए हैं?(2014,23) 

कलाकारों के हाथों नर-नारी, राजा-रंक, भिक्षु- बिलासी तथा पुश-पक्षी सभी सिरजते गए।


खण्ड काव्य

डॉ० राजेन्द्र मिश्र द्वारा रचित 'मुक्ति दूत' खण्ड काव्य गाँधी जी के जीवन-दर्शन का एक पक्ष चित्रांकित करता है। इस कथानक की घटनाएं सत्य तथा ऐतिहासिक है। कवि ने इस खण्ड-काव्य को पाँच सर्गो मे विभाजित किया है

(i) 'मुक्ति दूत' खण्डकाव्य के आधार पर गाँधी जी का चरित्र चित्रण कीजिए ?



प्रथम सर्ग

प्रथम सर्ग में' कवि ने महात्मा गांधी आलोकिक (जिसे देखा न गया हो) लेकिन मानवीय (लेकिन हम मानवीय रूप में देख सकते हैं) की  विवेचना की है। पराधीनता के कारण उस समय भारत की दशा अत्यधिक दयनीय थी। आर्थिक, सामाजिक, अथवा राजनितिक सभी परिस्थिति में भारत का शोषण हो रहा है। अवतारवाद की धारणा से प्रभावित होकर जब संसार में अत्यधिक पाप बढ़ जाता है, तब ईश्वर किसी मानव के रूप में जन्म लेते हैं। जैसे अत्याचारी रावण से मानवता को मुक्ति दि‌लाने के लिए श्रीराम का तथा अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए श्री कृष्ण का अवतार हुआ। इसी प्रकार भारत के परित्राण के काठियावाड़ी प्रदेश पोर्बन्दर में मोहनदास कर्मचन्द्र गाँधी नाम एक महान विभूति का जन्म हुआ था। महात्मा गाँधी का शरीर तो दुर्बल था परंतु उनकी बातों में अत्यधिक बल था। इन्होंने भारत को स्वतंत्र करने लिए उन्होंने तीस वर्षों तक जो उन्होंने किया वह भारत तथा इसके वासियों को सदा स्मरणीय रहेगा। इनके अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप ही भारतवर्ष को स्वतन्त्रता प्राप्त हो सकी।


अथवा

(ii) 'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग का कथानक अपने शब्दों में लिखिए?

चतुर्थ सर्ग
चतुर्थ सर्ग में भारत की स्वतंत्रता के लिए गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। जनता ने विदेशी सामानों का बहिष्कार किया लोगों ने अंग्रेजों की नौकरी तथा उपाधियाँ भी लौटा दी। इस प्रकार सारा देश गाँधी जी के पीछे आंखे मून्दकर चल पड़ा साइमन कमीशन में एक भी भारतीय अफसर न होने के कारण गाँधी जी ने 'साइमन कमीशन' का भी विरोध किया। इस आंदोलन में पंजाब केसरी लाला लाजपत राय तथा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भी शामिल हुए।

पंजाब केसरी तड़प उठा साइमन कमीशन पीछे जा।।
नेता सुभाष फिर गरज उठा साइमन कमीशन पीछे जा।। 

साइमन कमीशन के विरुध्द इस आंदोलन में लाला लाजपत राय की मृत्य हो गई थी। परन्तु गाँधी ने इस आन्दोलन को अहिंसा से आगे बढ़ाया। साथ-ही- साथ गाँधी जी ने भारत वासियों को भी अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। गाँधी जी ने नमक पर लगने वाले ऋण को हटाने के लिए तथा 'नमक कानून' को तोड़ने के लिए 'दांडी यात्रा' प्रारम्भ की। 'भारत छोड़ो आन्दोलन' के चलते गाँधी जी तथा बड़े-बड़े नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया गया। फिर पूरे देश में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन बहुत तेज हो गया, इस आन्दोलन में विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई, पुलिस थानों में आग लगा दी, रेलवे लाइनों को उखाड़ फेंका सड़को तथा पुलों को भी जनता ने आक्रोश में तोड़ दिया। गाँधी जी जब अनशन कर रहे थे तब उसी समय उनकी पत्नी कस्तूरबा की मृत्यु कारावास (जेल) में हो गई। परन्तु पत्नी के स्वर्गवास के पश्चात् भी  उन्होंनें अनशन जारी रखा तथा भारत को स्वतंत्रता दिलाई। 


प्रश्न-6 (क) दिये गए लेखकों में से किसी एक का जीवन परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए: 
(शब्द सीमा अधिकतम 80 शब्द) 3+2=5


(i) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद


नाम : राजेन्द्र प्रसाद
जन्मः 3 दिसम्बर सन् 1884 ई0
जम्न स्थानः बिहार राज्य के छपरा जिले के जीरादोई नामक ग्राम में
पिता का नाम : महादेव सहाय
शिक्षा : एम. ए. और एल.एल.बी.
रचनाएँ : गाँधी जी की देन, शिक्षा और संस्कृति, मेरी आत्मकथा, बापू के कदमों में आदि ।
मृत्यु :28 फरवरी सन 1963 ईo

जीवन परिचय :- सफल राजनितिज्ञ तथा प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार देशरत्न डॉ० राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 3 दिसम्बर सन् 1884 ई० को 'बिहार राज्य के छपरा जिले के जीरादोई नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम महादेव सहाय था। इनका परिवार गाँव के सम्पन्न तथा प्रतिष्ठित कृषक, परिवारों में से था। ये अत्यंत मेधावी छात्र थे। इन्होंने कलकत्ता विश्व विद्यालय से एम.ए.' और कानून को डिग्री एल.एल.बी की परीक्षा‌एँ उत्तीर्ण की। सदैव प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले राजेन्द्र प्रसाद ने मुजफ्फरपुर के एक कॉलेज में अध्यापन (टीचर) का कार्य शुरू किया। इन्होने सन् 191/ई० में वकालत शुरू की अथवा सन् 1920ई० तक इन्होने कोलकाता तथा पटना में भी वकालत करी। इसके पश्चात् इन्होंने वकालत छोड़ दी तथा देश की सेवा में लग गए। इनका मन प्रारम्भ से ही राष्ट्र सेवा में लगा हुआ था। सन् 1917 ईo में इन्होंने गाँधीजी के साथ मिलकर चम्पारन के किसानों के लिए आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई अथवा इन्होंने पूर्णतः वकालत छोड़ दी। डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने अनेकों बार जेल की यातनाएँ भी भोगी। इन्होंने विदेश जाकर भारत के पक्ष को विश्व के सामने प्रस्तुत किया। डॉ० राजेन्द्र प्रसाद भारतीय काँग्रेस के सभापति रहे भारत की सेवा करते रहे। इन्हे भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया । डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी की मृत्यू सन् 1963 ईo में हुई। 


रचनाएँ : गाँधी जी की देन, शिक्षा और संस्कृति, मेरी आत्मकथा, बाबू के कदमों में आदि।। 

(ii) रामधारी सिंह 'दिनकर'

नाम :- रामधारी सिंह 'दिनकर',
जन्म :-23 सितम्बर सन् 1908 ईo
जन्मस्थान :-बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया नामक स्थान पर।
पिता का नाम:- श्री रवि सिंह।
शिक्षा :- बी. ए.
मृत्यु :- 24 अप्रैल सन् 1974 ईo 

प्रमुख रचनाएँ:- रेणुका, सरस्वती, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतिज्ञा, कुरुक्षेत्र, ऊर्वशी, अर्द्धनारीश्वर, संस्कृति के चार अध्याय, मिट्टी की और बापू, हुंकार आदि।

जीवन परिचय - शुक्ल युग के श्रेष्ठ निबन्धकार रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्म 23 सितंबर सन् 1908 ईo को बिहार के 'मुंगेर जिले के सिमरिया नामक ग्राम में हुआ था। इनका परिवार एक साधारण कृषक परिवार था। इनके पिता का नाम श्री रवि सिंह तथा माता का नाम श्रीमती मनरूप देवी था इन्होंने पटना विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की परन्तु पारिवारिक कारणों से यह आगे न पढ़ सके। सन 1934 ई० में इन्होने सरकारी विभाग में रजिस्ट्री का कार्य किया। इसाने पहले यह एक माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाचार्य रह चुके थे। इसके बाद दिनकर प्रसारण विभाग में उपनिदेशक के पद पर कार्य करते रहे। सन् 1950 ईo में इन्हें मुजफ्फरपुर के महाविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष बनाया गया। 1952 ई० में दिनकर राज्यसभा के सदस्य बने । सन् 1972 ई० में इनकी रचना उर्वशी के लेखन के लिए सम्मान के तोर पर इन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरुस्कार से सम्मानित किया।

इनकी मृत्यू 24 अप्रैल सन् 1974 ईo को हुई। 

रचनाएँ:- रेणुका, सरस्वती, रश्मिरची, पात्शुराम की प्रतीक्षा कुरुक्षेत्र, ऊर्वशी, संस्कृति के चार अध्याय आदि।। 

(iii) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

नाम :- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
जन्म :- 4 अक्टू‌बर 1884 ईo 
जन्म स्थान - बस्ती जिले का अगोन ग्राम
पिता का नाम - चन्द्रबली शुक्ल
शिक्षा - एक. ए (इंटरमीडिएट) भाषा
आजीविका - अध्यापन लेखन, प्रधानाध्यापक
मृत्यु :- 2 फरवरी सन् 1941 ईo
युग- शुक्ल युग

जीवन परिचय:- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी भाषा के उच्चकोटि के महत्वपूर्ण निबंधकार एवं समलोचक थे। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 1884 ई० में बस्ती जिले के अगोना नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री चन्द्रबली शुक्ल था जो मिर्जापुर में कानूनगो थे और इनकी माता बहुती धार्मिक स्त्री थीं इनका परिवार अगोना ग्राम में एक प्रतिष्ठित परिवार था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा उनके पिता के पास राठ की तहसील में हुई । उसके पश्चात इन्होंने मिशन स्कूल से दसवीं कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण की। रामचन्द्र शुक्ल गणित में कमजोर थे।
फिर इन्होंने एक० ए० (इंटरमीडिएट) की शिक्षा इलाहबाद के एक (1904 ईo) विद्यालय से ली, लेकिन परीक्षा से ही इनका विद्यालय छूट गया रामचन्द्र शुक्ल ने मिर्जापुर के न्यायालय में नौकरी करना प्रारम्भ कर दिया, परन्तु वह नौकरी इनके स्वभाव के अनुकूल (लायक) नहीं थी। फिर उन्होंने न्यायालय में नौकरी से इस्तीफा दे दिया। अत: इन्हें मिर्जापुर के ही मिशन स्कूल में चित्रकला के अध्यापक के रूप में नौकरी मिली। हिन्दी साहित्य में इनका बहुत बड़ा योगदान है। सन् 1941 ईo में इनका स्वर्गवास होगया।

रचनाएँ:- चिन्तामणि, विचार संधिवा, हिन्दी साहित्य का इतिहास, तुलसी ग्रंथावली, सूरदास, रस मीमांसा।

(ख) दिये गये कवियों में से किसी एक का जीवन परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए:
(शब्द सीमा अधिकतम 80 शब्द) 3+2=5


(i) बिहारीलाल

नामः बिहारीलाल
जन्मः 1603 ईo
जन्म स्थान: ग्वालियर के बसुआ नामक स्थान पर
पिता का नाम : श्री केशवराय चौबे 
गुरु का नाम : आचार्य केशवदास
मृत्युः सन् 1663 ईo
प्रमुख रचनाः बिहारी सतसई

जीवन परिचय:-

रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि बिहारीलाल का जन्म सन् 1603 ई० संवत (1600 विo के आसपास) ग्वालियर के निकट बसुता गोविन्दपुर ग्राम में
हुआ था। था। 
इनके पिता श्री केशव राय थे। इन्हें मथुरा के चौबे ब्राहम्ण माना जाता है। कई विद्वान इन्हें संक्रमाण आचार्य केशवदास का पुत्र मानते थे। बिहारीलाल ने स्वामी नर हरिदास से संस्कृत तथा प्राकृत का अध्ययन किया। इनका बचपन ससुराल मथुरा में बीता था।
मुगल बादशाह शाहजहाँ ने इन्हें आगरा निमंत्रित किया। इसके पश्चात यह जयपुर के राजा जयसिंह के दरबार कवि हो गए। राजा जयसिंह अपनी नवविवाहित, पत्नी के मोह में राजकाज से विमुख हो गए। बिहारीलाल ने उन्हें कार्य-पथ पर लाने हेतु एक दोहा लिखा जिसे पढ़ कर राजा जयसिंह पुनः अपने कर्तव्य-पथ पर लौट आए वह राजा के हेतु दोहे लिखते जिसने उन्हें स्वर्ग-मुद्रा मिलती थी। पत्नी के निधन के बाद वह भक्ति में लीन हो गए। ततपश्चात उनकी मृत्यु सन् 1663 ईo को हुई।

रचना - बिहारी सतसई। 

(ii) सूरदास

नामः सूरदास
जन्म: सन 1478 ईo
जन्मस्थान: आगरा के सुनकता नामक स्थान पर
पिता का नामः पंo रामदास जी
गुरु का नामः श्री वल्लभाचार्य
मृत्यु: 1583 ईo
प्रमुख रचनाएँ: सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी।

जीवन परिचय - श्री कृष्ण भक्त सूरदास का जन्म सन 1478 ई० को आगरा-मथुरा भार्ग पर सनकता नामक ग्राम में हुआ था। कुछ विद्वान सीटी (दिल्ली के निकट) को इनका जन्म स्थान मानते हैं। 

इन्होनें श्रीकृष्ण की बाल लीलाजों का, मानव स्वभाव का तथा प्राकृति का ऐसा सजीव वर्णन किया है, जिसे आँखों से देखना सम्भव नहीं है। इन्होने स्वयं को जानमंद कहा है। (जन्म से अंधा)। सूर दास की रुचि बचपन से ही भगवद भक्ति के गानों में थी। इनसे भक्ति का एक पद  सुनने के बाद महाप्रभु वल्लभाचार्य ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया। इन्हें श्रीनाथजी के मन्दिर में कीर्तन का कार्य सौंप दिया। श्री वल्ल्‌भार्च के पुत्र विट्‌ठलनाथ ने अष्ठधाप नामक आठ कवियों का एक समूह बनाया । सरदास इन सबमें सर्वश्रेष्ठ थे। वे गऊ घाट पर रह कर श्रीकृष्ण की गायाओं का गायन करते थे। विट्‌ठलनाथ के सामने 'खंजन नैन सब माते' पद गाते समय इनकी मत्यु सन 1583 ई० में हुई। 

रचनाएँ- सूरसागर, सूरावली, साहित्य लहटी।


(iii) मैथिलीशरण गुप्त

नाम :- मैथिलीशला गुप्त
जन्म:- 3 अगस्त सन 1886 ईo
जन्म स्थान:- झांसी जिले को चिरगांव नामक स्थान
पिता का नाम:- सेठ रामचरण गुप्त
मृत्यु - 12 दिसम्बर 1964
रचनाएँ:- साकेत, यशोधरी, भारत-भारती, झापर, जयप्रभवान

जीवन परिचय - राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त सन् 1886 ईo को झांसी के चिरगांव में हुआ इसके पिता का नाम सेठ रामचरण गुप्त तथा माता का नाम श्रीमती कौशल्या बाई था। इनके माता पिता परम वेष्णव थे। 
इनकी रुचि खेलकूद में अधिक थी जिससे इनकी पढ़ाई अधूरी रह गई । इन्होंने घर में ही हिन्दी, संस्कृत, बंगला साहित्य का अध्ययन शुरू किया।
मुशी अजमेरी ने इनका मार्ग दर्शन किया । 12 वर्ष की आयु में इन्होंने कविता लिखना प्रारम्भ किया। 
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के साथ जुड़ने पर इनकी खड़ी बोली की मासिक पत्रिका 'सरस्वती' प्रकाशित हुई । प्रथम काव्य संग्रह 'रंग में भंग' तथा 'जयद्रथ वध' की भी प्रकाशित किया गया। 
भारत-भारती के प्रकाशन से इनकी लोकप्रियता सर्वत्र फैल गई। फिर इन्होंने स्वतः प्रेस की स्थापना की तथा छापना शुरू किया 'साकेत' तथा 'पंचवटी' को 1931 ई० में प्रकाशित किया। 
दिल को दोरा पड़ने से चल बसे। अंततः इनकी मृत्यु 12 दिसम्बर 1964 ईo को हुई। 
रचनाएँ- साकेत, यशोधरा, भारत-भारती, आयर, जयद्रथवध आदि।। 


प्रश्न-7 अपनी पाठ्य पुस्तक से कण्ठस्थ कोई एक श्लोक लिखिए जो इस प्रश्नपत्र में न आया हो? (02) 


(i) बन्धनं मरणं वापि जयो पराजया उभयत्र समो वीर हि वीरता।

 
अनुवाद:- चाहे बंधन हो या मृत्यु चाहे जीत हो या हार, 
        दोनों ही स्थितियों में वीर समान रहता है; वी का भाव ही वीरता है।

या

(ⅱ) सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दुख भाग भवेत्।

 
अनुवाद:- सभी सुखीः रहें, सभी स्वस्थ रहे, सभी का कल्याण हो किसी को भी दुःख न हो।


प्रश्न-8 निम्नलिखित में से किन्ही दों प्रश्नों का उत्तर संस्कृत में दीजिए:    (1+1=2) (किन्ही दों प्रश्नों का उत्तर दीजिए) 

(i) भारतीय संस्कृत मूल किम् अस्ति?

उत्तर:- विश्वस्य स्रष्टा ईश्वरः अस्ति, इति भारतीय संस्कृति मूलम् अस्ति।

(ii) का संस्कृतिः सदा गतिशीला वर्तते?

उत्तर:-भारतीय संस्कृति सदा गतिशील वर्तते।

(iii) पुरुराजः केन सह युद्धम् अकरोत?

उत्तर:- पुरुराज अलतेन्द्रेण सह युध्दम अकरोत् ।

(iv) चन्द्रशेखरः कः आसीत्? 

उत्तर:- चन्द्रशेखरः एकः प्रसिध्द्ध: क्रांतिकारी देशभक्त च असीत्








प्रश्न-9 निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर निबन्ध लिखिए (शब्द सीमा अधिकतम 200 शब्द) 1+6=7

(i) पर्यावरण प्रदूषण


प्रदूषण यह वह वस्तु है, जो हमारे आस-पास के पर्यावरण को बर्बाद कर रही है साथ ही साथ यह सजीवों को भी मृत्यु की और ले जा रही है।

सजीव जैसे मानव, पशु-पक्षी और कुछ प्रकार वनस्पतियों को भी प्रदूषण मृत्यु की ओर ले जा रहा हैं। परन्तु मुख्यतः यह मानवों को नष्ट कर रहा है। जैसे कि कई प्रकार की बीमारियों जैसे कैंसर, दिल की बीमारी आदि। 
हम मान‌वों में यह मुख्तः हमारे आस-पास के वातावरण जिसमें हमारा खान-पान, श्वास लेना भी शामिल हैं। कुछ लोग जो धूम्रपान, मदिरापान (शराब) अथवा तम्बाकू जैसी हानिकारक वस्तुओ को अपने रोजाना के सेवन में शामिल करते हैं, वे इस कैंसर से पीड़ित हैं साथ ही साथ वे लोग भी जो इनका सेवन कभी-कभी करते है और वे लोग भी जो धूम्रपान, करने वालों के आस-पास की वायु में श्वास लेते हैं। 

जो लोग इन सभी चीजों से दूर रहते हैं, वे भी कैंसर, हृदय रोग आदि से पीड़ित है आखिर क्यों ? इसका जवाब हमें उन सब लोगों के खान-पान मैं ही मिलता है। 
जैसे कि खाना खाने के लिए प्लास्टिक की प्लेट, कटोरियों अथवा डिस्पोजल कप आदि हम जिन प्लास्टिक की बोतलों से पानी पीते हैं, वे भी इसी में शामिल है। आपने देखा होगा कि जब हम कहीं भी घर से दूर होते हैं, तो हम सभी प्लास्टिक की बोतले पानी तथा कोल्डड्रिंक खरीदते व पीते है। प्लास्टिक की बोतले वैसे तो हमारे लिए खतरनाक नही है, परन्तु जब हम इन्हें लाने समय तक या फिर वह बोटले थोड़ी देर के लिए भी (पेय के साथ) धूप में रखी जाए तो उनका प्लास्टिक पेय में घुल जाता है। और इसे लम्बे समय तक प्रयोग में लेने से हमें अनेकों प्रकार की बीमारियाँ घेर लेती हैं।
सांस लेने पर हम जब वायु को अन्दर लेते हैं, तो वातावरण में मौजूद गैसों का ह‌मारे स्वास्थ्य पर अधिक असर पड़ता है। चाहे वे गैस ऑक्सीजन या कार्बन डाई ऑक्साइड। अपने देखा होगा कि जब हम सुबह-सुबह टहलते हैं, तो हमारे शरीर में कुछ उत्तेजना सी होती है, इसका कारण ऑक्सीजन है, क्योंकि रात-भर कुई प्रदूषण फैलाने वाली वस्तुएं नही चलती है। और हर वर्ष दिवाली के पर्व के पश्चात् कुछ लोग बीमार पड़ जाते है, जिसका कारण उनका कमजोर शरीर है, जो पटाखों से निकली गैसों को झेल नहीं पाता है। 

प्रदूषण के अनेकों कारक हैं पर कुछ निम्नलिखित हैं- 

फैक्ट्री - यह एक प्रमुख कारण है, जो प्रदूषण को बढ़ावा देता है कई कारखाने जैसे कि काँच का कारखाना को बन्द करने पर बहुत नुक्सान का सामना करना पड़ता है। अंतः ये मजदूरों की अनुपस्थिति में भी चलते रहते हैं।

आवाजाही के साधन - अपने देखा होगा कि जब कोई मोटर-साइकिल चलती है तो वह धुआ छोड्‌ती है। साथ ही साथ सभी वाहन जो बिज‌ली से चलते हैं, वह भी प्रदूषण करते हैं। विद्युत वाहन चलते समय तो प्रदूषण नहीं करते परन्तु इन्हें बनाते समय और इतना प्रदूषण होता है, जिसकी गिनती ही नहीं है।

बिजली बनाने में :- ज्यादातर बिजली बनाने के लिए कोयले का प्रयोग किया जाता है, परन्तु हम कई विभिन्न तरीकों से भी बिजली बनाते हैं। परन्तु कोयला जलाने पर अत्यधिक प्रदूषण होता है।

(249 शब्द) 


(ii) विज्ञान : अभिशाप या वरदान

विषय - विज्ञान वरदान या अभिशाप
भूमिका- आज का युग वैज्ञानिक चमत्कारों का युग है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विज्ञान का महत्वपूर्ण योगदान है। यह वह शक्ति जो विशेष ज्ञान के आधार पर नए-नए आविष्कार कर सकती है तथा कई दशकों से करती हुई आ रही है। यह हमें नई सोच देती है। यह नई सोच रचनात्मक भी हो सकती है तथा विध्वंसात्मक भी। विज्ञान का रचनात्मक रूप मानवता के लिए एक बहुत बड़ा है। जैसे, कि जीव विज्ञान से हम 50 वर्ष जी सकने वाले प्राणी को कुछ अधिक समय जैसे 60 वर्ष तक जीवित रख सकते है तथा इंसानों के द्वारा बनाए गए परिवहन के साधन तो अत्यंत लाभकारी हैं परन्तु यह शक्ति अगर विध्वंसात्मक हो तो यह एक बहुत बड़ा अभिशाप भी है।


विज्ञान का 'वरदान' रूप - 
‎जिस प्रकार प्राचीनकाल में देवताओं से वरदान मांगने पर, उनके तथास्तु कहने के साथ ही मनचाही इच्छा पूरी होने की बाते हमने कथा - कहानियों में सुनी तथा पढ़ी हैं। वैसे ही अगर हमें गर्मी के मौसम में हवा चाहिए हो तो हम एक बटन के द्वारा पंखा चला सकते हैं। यह विज्ञान की ही तो देन है। विज्ञान के बल पर नेत्रहीन (अंधे) की दुनिया भी बदल चुकी है। विज्ञान की सहायता से बहरों (जो सुन न सके) को सुनने की शक्ति मिल रही है अपंगों को मानवनिर्मित अंग मिल रहे हैं। नि: संतानों की संतानें मिल रहीं हैं। असाध्य समझे जाने वाले रोगों का भी इलाज विज्ञान की सहायता से हो पा रहा है। हमने पहले पढ़ा 50 वर्ष जीने वाले व्याक्ति को हम विज्ञान की सहायता से 60 वर्ष या 60 वर्ष से अधिक तक भी जीवित रख सकते हैं। ‎इस प्रकार हमने अकाल मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर ली है। बाथरूम में एक बटन दबाते ही शावर (इन्द्रदेवता) वर्षा करने लगते हैं तथा कमरे में बैठे-बैठे एक बटन दबाते ही पंखा चलाकर 'वायु' देव को भी बुला पाते हैं। यह सब विज्ञान ही तो है। रेलगाड़ी दौड़ाना, हवाई जहाज उड़ाना, पानी बांधकर बिजली बना पाना तथा चलती हुई हवा से भी बिजली बना पाना भी मानवता के लिए वरदान है। हमें आकाश की ऊँचाई तथा पृथ्वी के भीतर या समुद्र के अन्दर की गहराई नापने में आसानी होना यह भी विज्ञान की सहायता से हो पा रहा है। हमलोग जब भी ऑनलाइन क्लास लेते हैं, तो हमारे मोबाइल फोन, टैबलेट, लैपटॉप तथा उसे जोडने वाले तार तथा इन्टर्नेट भी विज्ञान की ही देन है। विज्ञान एक ऐसा वरदान है जिसने संसार की हर वस्तु को इस समय हमारी मुट्ठी में ला दिया दिया है।




(iii) यातायात के नियम

भूमिका:- सभ्य समाज के सामाजिक जीवन का आधार नियमबद्धता है। यातायात के तीव्रतम आधुनिक साधनों को व्यवस्थित रूप से रखने के लिए इसी नियमबद्धता की बहुत आवश्यकता पड़ती है। जिसके कारण  हम छोटे वाहन जैसे मोटरसाइकिल तथा बड़े वाहन जैसे कारें, ट्रक, बस आदि को हम नियमित रूप से दौड़ता हुआ देख सकते हैं।

नियमों का विधान- हर राष्ट्र की सरकार यातायात को सुचारित रूप में रखने के लिए यातायात के नियम तथा उपनियमों को लागू करती है। यदि इन नियमों पर काई ध्यान न दे तो दुर्घटना भी हो सकती है। जैसे कि एक कहावत है सावधानी हटी दर्घटना घटी। 

नियमों की जरूरत - वास्तव में यातायात के नियम हमारे अच्छे के लिए ही बनाए गए हैं। सड़‌कों पर कई प्रकार के वाहन जैसे- ट्रक, बस, कार, रिक्शे, स्कूटर तथा पैदल यात्री भी चलते हैं। ये सभी यातायात के नियमों का पालन करते है, जिस कारण ये सभी सड़‌कों पर सुगमता से चल पाते हैं तथा एक साथ ही मार्गों पर आ जा सकते हैं। परंतु जब भी इन यातायात के नियमों की अवहेलना की जाती है, तब-तब हमारे सामने कोई बड़ा हादसा हो जाता है।

नियमों के प्रकार -


(ⅰ) वाहनों की गति - 
जैसे कि हम जानते हैं कि बाइक या स्कूटर की गति सीमा शहर में 60 किमी / घंटा है। परन्तु यह एक्सप्रेसवे पर 80 किमी / घंटा हो सकती है।
इस प्रकार कार शहर में 60 किमी / घंटा तथा हाईवे पर 120 किमी / घंटा की गति से भाग सक‌ती है। ट्रक शहर में 50 किमी / घंटा तथा हाईवे पर 100 किमी / घंटा की गति से भाग सकते है क्योंकि शहरों में दुर्घटनाएँ अत्यधिक होती है।
बस शहर में 60 किमी / घंटा तथा हाईवे पर 100 किमी / घंटा की गति पकड़ सकती है। 
परन्तु कुछ क्षेत्रों में वाहनों की गति को सरकार बड़ा या घटा सकती है, जैसे अधिक जनसंख्या या कम जनसंख्या वाले क्षेत्र।

यातायात पुलिस-
यातायात के नियमों को लागू करवाने तथा वाहनो की गति को नियंत्रण में रखने हेतु यातायात पुलिस को मार्गो पर व्यव‌स्थित किया जाता है। प्रत्येक बड़े और व्यस्त चौराहे पर गोल चक्कर के रूप में एक ट्रैफिक आइलेण्ड बना होता है जिस पर यातायात पुलिसकर्मी खड़े होकर राहगीरों अथवा वाहनों को विभिन्न प्रकार के निर्देश देते हैं तथा जो निर्देश पुलिसकर्मी देते हैं, उसका पालन करना नागरिकों का दायित्व होता है। वैज्ञानिक क्रांति के कारण अब चौरा‌हों पर रंगीन लाइटों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें ट्रैफिक सिग्नल कहा जाता है। इसमें तीन प्रकार की लाइट होती है।
जैसे- लाल, पीला तथा हरा। 
लाल का उपयोग वाहनों को रोकने के लिए, पीले का वाहन चलने हेतु तैयार होने के लिए तथा हरी लाइट का संकेत वाहन ले जाने हेतु होता है।

सार्वभौमिक नियम- 
सड़‌क पर चलने वाले पैदल यात्रियों को सदैव
सड़‌कों के किनारों पर चलना चाहिए तथा जितना संभव हो पाए, उतनी एकसमान गति से चलना चाहिए वाहन स्वामियों को हॉर्न का उपयोग आवश्यकता पड़‌ने पर ही करना चाहिए। बार-बार हॉर्न का उप‌योग करना ध्वनि प्रदूषण का कारण बनता है। पीछे के वाहन को ओवरटैक करते समय हॉर्न बजाना चाहिए तथा अपने वाहन को बाहिनी ओर मोड़ना चाहिए। हमें अपने वाहन को सदैव बाई और मध्य में चलाना चाहिए। दाहिनी दिशा सदैव आने वाले वाहनों के लिए खाली छोड़‌ना चाहिए।
हमें घुमावदार मोड़ पर वाहन की गति को सदैव ही कम रखना चाहिए नहीं तो बहुत ही दर्दनाक दुर्घटना हो सकती है। 

निष्कर्ष- वाहन हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सड़‌क पर चलना तथा तीव्र गति से दौड़ाना भी हमारी नियमित क्रिया बन चुकी है। अतः इस तेज धमाचौकड़ी में गंतव्य तक सही सलामत पहुंचना हो तो हमें इन यातायात के नियमों का पालन करना परम आवश्यक है।


(iv) जनसंख्या वृद्धि : लाभ या हानि ।

भूमिका- जनसंख्या वृद्धि का अर्थ है किसी देश में लोगों की संख्या l। लोगों की मृत्यु जन्म या प्रवासन (दूसरी जग‌हों से आने) के कारण जनसंख्या वृद्धि होती है। जब जन्म लेने वालो की संख्या मरने वालों से अधिक हो जुए तब जनसंख्या वृद्धि होती है। भारत एक विकासशील देश है, जिससे इसकी जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हो रही रही है। जन‌संख्या के माम‌ले में भारत चीन से आगे निकलकर  पहले स्थान पर पहुंच गया जिसकी जनसंख्या वर्ष 2011 में 121 करोड़ थी और अब 140 करोड़ पहुंच गई है। 


जनसंख्या वृद्धि के कारण - 

① ऊँची जन्मदर:- भारत में जन्मदर अधिक है, क्योंकि यहाँ की जलवायु गर्म होने के कारण यहाँ के बच्चे जल्द ही व्यस्क हो जाते है, जिसके कारण इनके विवाह जल्द भी हो जाते हैं, जिससे सन्तानों को यह जोड़े जन्म देते हैं। इस कारण भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है।

② मृत्युदर में गिरावट:- चिकित्सा सुविधाओं के कारण यहाँ मृत्युदर में गिरावट आई है, जिससे कि 50 वर्ष जीने वाला व्यक्ति 60-70 तक वर्ष जी सके।

③ प्रजनन क्षमता का अधिक होना:- भारतीय स्त्रिरों की प्रजनन क्षमता अधिक होती है, जिससे परिवार तेजी से बढ़ता है।

④ निर्धनता:-  देश की अवनति तथा गरीबी से भी भारत में जनसंख्या वृद्धि हुई है। गरीबी के कारण भारत के लोगों में शिक्षा का अभाव भी रहा है। शिक्षा न होने के कारण वह अंधविश्वासी है, वे सन्तानों को ईश्वर की देन मानते हैं। वे पुत्र की कामना में कई पुत्रियों को जन्म दे देते हैं जिससे कि जनसंख्या वृद्धि हो रही है।

⑤ शरणार्थियों का आगमन:- देश की स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में पाकिस्तान तथा बांग्लादेश से लोग आकर बसने लगे जिससे कि भारत की जनसंख्या और तेजी से बड़ी है।

जनसंख्या वृद्धि को रोकने के उपाय:- 

हमें सर्वप्रथम शिक्षा का विस्तार करना होगा। अशिक्षित लोग न तो अपने भविष्य के बारे में सोच पाते और ना ही देश व सांसारिक समस्याओं तक पहुंच पाते है। शिक्षा के विस्तार से जनसंख्या नियंत्रण में सहायता मिलती है। हमारे विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा को महत्वपूर्ण विषय‌ के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। परिवार कल्याण कार्यक्रम को हमें प्रसारित करना चाहिए। सरकार का उत्तरदायित्व है कि वह परिवार नियोजन का प्रचार करें तथा ग्रामीणों को परिवार नियोजन की सारी सुविधाएँ दे।  सरकार को सीमित दामपत्तिव्य परिवारों को पुरस्कृत करना चाहिए। परन्तु लोगों में भी परिवार नियोजन की चेतना का भी विकास होना चाहिए। 

निष्कर्ष:-
इस प्रकार हम देखते हैं कि जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ कई प्रकार की और भी समस्याएँ उत्पन्न हो ज्ञाती हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए जनसंख्या नियोजन आयोग को स्थापित किया जाए लोगों में शिक्षा का प्रसार हो खासकर महिलाओं में शिक्षा को बढ़ाया जाए। परिवार नियोजन कार्यक्रमों को प्रभावशाली बनाया जाए तथा बाल विवाह को पूरी तरह बन्द कर दिया जाए।

प्रश्न-10 उत्तर मध्य रेलवे को एक ऐसा शिकायती पत्र लिखिए जिसमें ट्रेन में हुए दुर्व्यवहार होने का उल्लेख हो? 1+3=4


सेवा में,

श्रीमान प्रबंधक‌ जी उत्तर मध्य रेलवे,
फिरोजाबाद, ऊ प्र० (283203)

विषय :- टिकट निरीक्षक द्वारा किए गए अभद्र व्यवहार की शिकायत के सम्बंध में।

महोदय

'सविनय निवेदन यह है, कि मैं 16 जनवरी को गोमती एक्सप्रेस से दिल्ली जा रहा था। मेरे साथ मेरी पत्नी और मेरा एक बच्चा भी था। यह घटना रात 9 बजे की है। रामपुर जंकशन के आस-पास टिकट निरीक्षक रमेश वर्मा मेरे पास आए और टिकर दिखाने को कहा। मैंने अपना और अपनी पत्नी का टिकट दिखाया तभी वे बोले कि आप अपने बच्चे का भी टिकट दिखाओ। मैं बोला कि पाँच वर्ष से छोटे बच्चे का टिकट नहीं लगता है, क्योंकि मेरा बच्चा पाँच वर्ष से कम आयु का है। तो इसका भी टिकट नही लगना चाहिए। इतना सुनते ही वो आग बबूला हो गए और मुझसे तथा मेरी पत्नी से अभद्र व्यवहार करने लगे। 

अंतः आपसे अनुरोध है कि टिकट निरीक्षक के विरु‌ध्द आवश्यक कार्यवाही करें ताकि दूसरे यात्रियों को ऐसी समस्या न हो।

सहधन्यवाद !

दिनांक - 18 जनवरी 2026

भवदीय
सागर। 

अथवा

अपनी रूचियो  का उल्लेख करते हुए अपने मित्र को पत्र लिखिए?



55/2
वैभव नगर
गाजियाबाद ।
दिनांक: 18 फरवरी 2025

प्रिय मित्र नितीश,

नमस्कार,आशा करता हूँ कि तुम कुशल होगे मैं भी कुशल मंगल हूँ। आज में ये पत्र अपनी रुचियों के बारे में बताने के लिए, लिख रहा हूँ। वैसे तो इस समय परीक्षा की तैयारी चल रही हैं, लेकिन मुझे समय मिलता है, तो में क्रिकेट खेलना, दोस्तों से बात करना पसंद करता हूं। क्रिकेट खेलने तथा दोस्तों से बात करके मुझे जो खुशी मिलती है वो खुशी किसी और चीज में नहीं मिलती। इसी के साथ में इस पत्र को लिखने का अंत करता हूँ।

चाचा-चाची जी को मेरा प्रणाम कहना।

तुम्हारा मित्र
राहुल।। 

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